दर्द पराया भी अपना होता है
इतना अपना
जैसे अस्थियों से चिपकी मज्जा
काँटों पर सजे फूल के अहसास सा
बादलों के संग वाष्प सा
वृक्षों के साथ पत्तो सा
जीवन पतझर में बसंत जैसा
कितना अपना होता है
दुर्घटना, कोई भी हो, कही भी
क्षत- विक्षत लाशें और
खून से लथपथ चेहरे
माँ से बिछुड़े मासूम देखकर
हज़ारों मील दूर, फिर भी
कितने नजदीक से लगते है
हमारी सुप्त संवेदनाये
स्वत: ही वहां झुक जाती है
साँसे कुछ रुक जाती है
क्योंकि दर्द जोड़ता है
हमें एक-दूसरे से

No comments:
Post a Comment