धुंध
बाहर धुंध है
धुआं है धूल है
अन्दर द्वन्द
मन की आँखों से भी
कुछ दिख नहीं पाता
शोर-ए-मरकज में
खड़े हैं
मगर सन्नाटा
नहीं टूटता
संकल्पों का अभाव
विकल्पों की भरमार
वातावरण विचित्र
सभी एक जैसे
सभी अपरिचित
आध्यात्मिक विक्षोभ है
पीडाएं बटती नहीं
धुंध छटती नहीं
धरा धूसर पर ये
कैसा तिमिर आन पड़ा?
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