मैं भोक्ता और तुम भोग्या
ऐसा मैं नहीं सोचता हूँ
अपनी मनीषा और हृदय भावों
के आलोक में, पल-प्रतिपल
तुम्हे सजाता, खोजता हूँ
अखिल प्रकृति में खिले सुन्दर
पुष्प की तरह तुम
मेरी निर्मल आस्था
तुम तक पंहुचकर जीवन
शून्य, शिथिल स्वर्गिक
विस्तृत शोर में छायी
शालीन ख़ामोशी तुम
न जाने कितने कोणों से
मै तुम्हारा स्वागत करता
लेकिन...........
आज मुझे तुम्हारी
कुंठा और घुटन का
मुझसे क्षण - क्षण
बढती दूरियों के
कारण, अकारण लगे
मेरी आस्था, अनास्था
में नहीं बदली
मै इस रिश्ते को और
अधिक क्लासिकल बनाऊंगा
मुझे पता चला तुम्हे
एड्स है इसलिए
आज तुम्हे जी भर
भोगना चाहता हूँ
एड्स आत्मा तक न फैले
रोकना चाहता हूँ

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