Sunday, February 19, 2012

Chubhan




इन आँखों में
कांच की तरह चुभती है
तुम्हारी याद
चकवई हो गयी है हर रात
स्वपन भी हो गए है नाराज
निहारता हूँ रात भर
टूटती हुई तारक रेखों को
शर्म से पीले पड़ रहे
भोर के चन्द्रमा को
पीड़ा के झरोखों से
टूटती-चटकती कलियों की
प्राय: मौन मद्धिम आवाजें
तोडती है सन्नाटा
जिन रिश्तों पर
कभी इतराता  था,
झेल रहा हूँ उनकी टूटन
कब तक करू, अहं से बात
अस्तित्व से आँख-मिचौली
कर रहा फिर वही प्रणय-निवेदन
हो सके, धो सको, तुम
अपने नयनों के खारे पानी से
इन कातर धुंधले-शीशो को

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