इन आँखों में
कांच की तरह चुभती है
तुम्हारी याद
चकवई हो गयी है हर रात
स्वपन भी हो गए है नाराज
निहारता हूँ रात भर
टूटती हुई तारक रेखों को
शर्म से पीले पड़ रहे
भोर के चन्द्रमा को
पीड़ा के झरोखों से
टूटती-चटकती कलियों की
प्राय: मौन मद्धिम आवाजें
तोडती है सन्नाटा
जिन रिश्तों पर
कभी इतराता था,
झेल रहा हूँ उनकी टूटन
कब तक करू, अहं से बात
अस्तित्व से आँख-मिचौली
कर रहा फिर वही प्रणय-निवेदन
हो सके, धो सको, तुम
अपने नयनों के खारे पानी से
इन कातर धुंधले-शीशो को

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