I
वेदना की हर सीम
तोड़कर गयी
बात कुछ ऐसी वो
छोड़कर गयी
अपनी ही रची हुई
उलझनों के
दबाव में ,तनाव में
डूबा रहता हूँ
मुग़ल गार्डन में भी
उबा रहता हूँ
नाता तोड़ गया कोई
कितनी निर्ममता से
हल्के से निकल गया
जीवन की घनता से
रोज-रोज कलह कलेश में
प्रेम को भूली बैठी थी
चौबीस घन्टे के समय बंध में
सौ -सौ बार मुझसे ऐंठी थी
चोबारे की दीवार पर टंगे हुए
ताजमहल को उसे दिखाया
कुछ इतिहास भी समझाया
कहा प्रेम की यह अमिट निशानी है
दुनिया जिसको याद करे ऐसी कहानी है
बहुत किये प्रयास
मगर हुआ निराश
अंकुर कोई करुणा का
उसमे न फूटा
शेष भ्रम मेरा भी, पलभर में टूटा
चौबारे ने भी हसकर
कहा, मै ताज नहीं
II
दीवार के दूसरे छोर पर
तीर तलवारों, क्षत-विक्षत लाशों से भरा
रक्त पिपासु आकृतियों से
भरा हुआ चित्र था एक धरा
जिसमें अंतहीन युद्ध में रत
मनुष्य पशुजात
कर रहे है आघात-प्रतिघात
शायद इस चित्र का
उस पर प्रभाव था
इसलिए हमारे उनके मध्य
प्रेम का अभाव था
यदि तुम्हे प्रेम होता
इस चौबारे को मै ताज बना देता
खुद शाहजहाँ तुझे मुमताज बना देता

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